卍 ऊँ देवीदास जू नमो नमः श्री सांवले नमो नमः| पुरवा अधिपति नमो नमः जय देवी दास जू नमो नमः|| 卍
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Friday, April 26, 2019

              सतनाम पंथ में एवं  समर्थ साहेब जगजीवनदास के शिष्यों मे प्रसिद्ध संत समर्थ साहेब देवीदास हुए आपके  तप 
  तेज नाम सुमिरन और सिद्धियों के बारे में जितना ही कहा जाए वह  सूर्य को दीपक दिखाने के ही बराबर होगा आपका जन्म बाराबंकी जिले में लक्ष्मणगढ़ नामक ग्राम में संवत 1735 भाद्रपद कृष्ण अष्टमी  दिन मंगलवार को हुआ था आपके जन्म के विषय में  रोचक कथा यह है कि पिता श्री भवानी सिंह जी गौरी शंकर के अनन्य भक्त थे लक्ष्मणगढ़ के समीप ही पांडव कालीन निर्मित गौरी शंकर का एक प्राचीन मंदिर है और  ऐसा कहा जाता है कि आपके माता-पिता ने 12 वर्षों तक गौरी शंकर की कठिन आराधना की एवं गौरी शंकर के वरदान स्वरुप ही साहब देवी दास का जन्म हुआ तत्कालीन समाज में विद्यालयी  शिक्षा का अधिक चलन ना  था परंतु आपने स्वाध्याय से हिंदी संस्कृत उर्दू अरबी आदि का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया जो आपके साहित्य में भी देखने को मिलती है आप इतने मेधावी थे कि दोनों हाथों से दो विभिन्न विषयों पर एक ही समय में साहित्य रचना करने में समर्थ थे  आपने समर्थ साहब जगजीवन दास जी महाराज से मंत्र दीक्षा ग्रहण कर बहुत दिनों तक कोटवा में रहकर गुरु सेवा व आराधन किया  तदुपरांत समर्थ साईं के कहने पर आप घर चले आए परंतु पुरवा ग्राम के नारदीय झील (जो अब नर्दा ताल के नाम से जाना जाता है कहते हैं देवर्षि नारद ने यही तपस्या की थी) का वातावरण आपको ध्यान सुमिरन के लिए उपयुक्त लगा इसी झील के नजदीक आपने छुहरिया पेड़ के नीचे कुटिया चबूतरा बना कर कठोर तप किया यह वृक्ष आज भी मौजूद है आप के चार पुत्र हुए( 1)श्री साहेब राम प्रसाद दास(2) श्री साहेब नीलाम्बर दास (3)श्री साहेब राम निवाज दास(4) श्री समर्थ साहेब अनूप दास ||    
             

आप की साहित्यिक रचनाओं में सुख सनाथ, गुरु चरन , विनोद मंगल ,शब्द सागर, नारद ज्ञान ,दीपक समाज, दोहावली, भ्रम विनाश ,भ्रमरगीत, चरण ध्यान ,ज्ञान ऐना ,भक्त- मंगल ,ककहरा नामा ,काजी नामा ,परवाना प्रतीत, आदि महा ग्रंथ हैं ज्यादातर ग्रंथ सत्य सुधा प्रकाशन रायबरेली से प्रकाशित हैं सतनामी ग्रंथों के प्रकाशन में सत्य सुधा प्रकाशन का अभूतपूर्व सहयोग रहा है  ऐसे कल्याणकारी सहयोग हेतु समस्त सतनामी भक्त समाज आपकी  (सत्य सुधा प्रकाशन की) सदैव ही मुक्त कंठ से सराहना करते हैं आप के प्रसिद्ध  सिद्ध  शिष्यों में (1) श्री महंत रामसेवक दास हरचंदपुर बाराबंकी(2) साध्वी  साहेब सोनादासी (3) साहेब निहालचंद राय (4)साहेब गिरवर दास आदि प्रमुख थे इसके अतिरिक्त (1)साहेब दिलबर दास(2)साहेब  नंदू दास (3) साहेब छोटे दास (4) साहेब  भाना दास जैसे सिद्ध संतों का वर्णन भी भक्ति विनोद नामक ग्रंथ में मिलता है आप 135 वर्ष की अवस्था में विक्रमी संवत अट्ठारह सौ सत्तर (1870)भाद्रपद अष्टमी को सतलोक लीन  हुए परंतु आज भी पुरवा धाम के समर्थ साहब देवीदास का स्मरण मात्र करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है पुरवा  धाम में प्रत्येक पूर्णमासी को मेला लगता है एवं प्रत्येक मंगलवार को भी अधिक भीड़ देखने को मिलती है किंतु वर्ष में 3 बड़े मेलों का आयोजन होता है जो रक्षाबंधन कार्तिक पूर्णिमा एवं माघ  जन्म सप्तमी को पड़ता है पुरवा  धाम लखनऊ से लगभग 40 किलोमीटर दूर हैदर गढ़ बछराएं और निगोहा के बीच में नगराम से 5 किलोमीटर पूर्व में स्थित है सतनाम संप्रदाय की अनंत कीर्तियों व यश गाथा को संकलित करना संभवत: बूते से बाहर की बात  है  तथापि कुछ  कथाये  संकलित करने  का  प्रयास  किया  गया  है  आशा  है  पुरवा  धाम  के  सभी  भक्त  लाभान्वित होंगे||

सादर  बंदगी

Tuesday, March 26, 2019

नारी चालीसा

🚩🌷श्री गणेशाय  नमः🌷🚩
अथ नारी चालीसा
दोहा:-
श्री गणेश वन्दन करूँ,गुरु पद रज सिर धारि।
ज्ञान भक्ति वर देहु मोहिं, अवगुन सकल नेवारि।।
नारी जग की ज्योति है, चारों जुग परमान।
आदिशक्ति सीता सती,अनुसूया मातु महान।।
चौपाई:-प्रथमहिं सतगुरु मातु मनावौं।-1
जासु कृपा निर्मल मति पावौं।।
बन्दउँ नारि चारि युग केरी।
देहु मातु मोहिं बुद्धि घनेरी।।-2
नारी आहिं सृस्टि कै कर्ता।
सकल जगत की पालन कर्ता।।-3
जब न होत जग जनम नारि को।
मातृ रूप करि सकत धारि को।।-4
नारि बिना नर जन्म न होई।
कोटि उपाय करै भल कोई।।-5
नारि बिना नर अहैं अधूरे।
जो सपनेहुँ होइ सकत न पूरे-6
नारी शक्ति केर अवतारा।
सोइ जानै जो करइ विचारा।।-7
बन्दउँ जगत नारि के रूपा।
एक से अधिक हैं एक अनूपा।।-8
दुर्गा काली चंडी रानी।
नारि रूप जगदम्ब भवानी।।-9
लक्ष्मी गौरि शारदा माता।
ये सब नारि रूप विख्याता।।-10
माता सुता बहन अरु नारी।
चारि रूप हैं अति सुखकारी।।-11
प्रथम रूप कन्या कै आही।
जाहि विलोकि सबै हर्षाहीं।-12
दूसर रूप बहिन बनि आवैं।
भाइन के मन अतिसय भावैं।।-13
तीसर रूप अनूप नारि कै।
बनि बनिता सुख परमधाम कै।।-14
जाकर नारि पतिव्रता होई।
कालहु सन्मुख आवै न कोई।।-15
चौथ रूप सब महँ अति पावन।
सबके हृदय बसै मनभावन।।-16
कहै जाहि माता जग सारा।
भई जासे यह सृष्टि पसारा।।-17
बिना मातु कोउ केहि विधि जनई।
केहि विधि लख चौरासी तरई।।-18
बिना नारि सूना संसारा।।
कहत अहउँ निज मति अनुसारा।।-19
नारी होत शक्ति कै रूपा।
जिनके गुण अति अकथ अनूपा।।-20
धन्य नारि प्रगटी जग आई।
जिनकै कहँ लगि करौं बड़ाई।।-21
नारि के रूप अहैं जग जेते।
बरनि को सकै कहाँ कवि केते।।-22
नारी सकल गुणन की खानी।
नारि शक्ति नहिं जाय बखानी।।-23
ममता की मूरति है नारी।
तासे है लागत अति प्यारी।।-24
नारि धर्म कै सहज सुभाऊ।
सपनेहुँ दुःख देहिं नहि काहू।।-25
दाया छमा शील संतोषा।
ये नारी के चरित विशेषा।।-26
नारि से होय जगत की रचना।
यह मन मूढ़ है मानत कस ना।।-27
नारी सकल जगत आधारा।
सब अपने मन करहु विचारा।।-28
चरित नारि के अमित अपारा।
सो तौ आज परा मंझधारा।।-29
हैं कछु अधम आज अस भाई।
कन्या जन्म न तिन्हहि सोहाई।।-30
कन्या भ्रूण हत्या करवावें।
करि कुकृत्य अति पाप कमावै।।-31
जब कन्या कै जन्म न होई।
जग विस्तार कवन विधि होई।।-32
आज की कन्या कल की नारी।
आगे चलि बनिहैं महतारी।।-33
कन्या जन्म जौ न ह्वै पाई।
मानव जाति लुप्त ह्वै जाई।।-34
सब मिलि कन्या लेहु बचाई।
यहिमा है सबका हित भाई।।-35
विनती सुनहु मातु जगदम्बा।
मातु मोरि नहिं करहु विलम्बा।।-36
आतुर धाय मातु तुम आओ।
पापिन को तुम राह दिखाओ।-37
बेबस भई आज की नारी।
मातु आय तुम लेहु उबारी।।-38
जेहि घर नारि मान नहिं होई।
वह घर सुखित कवन विधि होई।।-39
जेहि घर होय नारि का आदर।
तेहि घर छलकत सुख की गागर।।-40
दोहा:-नारी से कन्या भई, कन्या से भई नारि।
कन्यावध अब न करौ,विनती सुनौ हमारि।।
और दान सब दान है, कन्यादान महादान।
कन्यादान जो करत हैं, तेहि समान नहि आन।
जे सन्मानै नारि का,तिन का परम अनंद।
कहत अधम जयबख्श अस,तेहि द्रवहिं सच्चिदानंद।।
यह नारी चालिसा नित,पढ़ै सुनै जो कोय।
नारि के प्रति आदर बढ़ै, सकल भाँति सुख होय।।।

सतनाम महातम

🌷🌷अथ श्री सतनाम महातम🌷🌷
श्री सद्गुरुवे नमः  श्री कोटवाधीशाय नमः
जयति जयति कोटवाधिपति,नटवर नंद किशोर।
कमलासुत पूरन करहु,सकल मनोरथ मोर।।
हमरे अवलम्बन सत्यनाम।
हमका यहि जय से कवन काम।।
सतगुरु साहब मोहिं अपनावा।
तब सत्यनाम हम गहि पावा।।
हम सत्यनाम सुमिरेन जबते।
कबहूँ बेराम नहि भेन तबते।।
जे सत्यनाम सुमिरै मन मा।
तिनके न दुःख व्यापै तन मा।।
जे बिसरेव सुमिरिन सत्यनाम।
ते गमन कीन्ह श्री हरि के धाम।।
जे बिसरि गये श्री सत्यनाम।
नहि आये जग के किसी काम।।
जे रटत रहत हैं सत्यनाम।
तिनका कुछ भी नहि परै खाम।।
यह सत्यनाम का सम्प्रदाय।
कोटवाधिराज दीन्हा चलाय।।
नहिं सत्यनाम सम मन्त्र और।
यहिमा है सगरे जग कै ठौर।।
गुरु चरनन में जिनकै है प्रीति।
तिनका कलियुग नहि सकै जीति।।
जे प्रीति किहिन गुरु पद रज से।
ते छूटि गए भव बन्धन से।।
जब ध्यान धरै गुरु चरणन मा।
सतनाम की आस जगै मन मा।।
जे गुरु पद पंकज सेवत हैं।
पतवार गुरुजी खेवत हैं।।
अपने गुरु पै विस्वास करै।
सतिनाम निरन्तर जाप करै।।
जे सत्गुरु की सेवा किन्हें।
ते गवन अमर पुर का कीन्हे।।
जे बिसरि गये अपने गुरु का।
ते चले गए सब यमपुर का।।
हमतौ गुरु पद रज शीस धरी।
सतनाम कै निशदिन जाप करी।।
सतपंथ केरि चारिव पावा।
इस युग के हैं वेद ग्रँथनि गावा।।
सतपंथ केरि चौदह गद्दी।
सुमिरत ही पाप हुवैं रद्दी।।
सतनामी भक्त अहैं जेतने।
सब भाँति अराध्य अहैं तेतने।।
जे एक हाथ मा बांधे धागा।
मन मोर चरण तिनके लागा।।
पहिने धागा जे दून्हौँ हाथे।
तिनकी पद धूलि धरूँ माथे
जे सत्यनाम की धुनि धरहीं।
भवसागर पार सहज करहीं।।
जय जगजीवन जय सत्यनाम।
जय अधम उधारन कोटवाधाम।।
निज दास जानि कै दया करो।
सब चूक हमारी माफ करो।।
सतनाम क़ै जाप करी हरदम।
जब तलक रहै यहि घट मा दम।।
आशीष यहै हम माँगित है।
सतगुरु चरनन सिर वारित है।सतगुरु चरनन सिर वारित है।।
सत्यनाम की धुनि धरै,चित गुरु चरनन पास।
जगजिवन दासकी कृपा ते,कबहुँ न होय उदास।।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

श्री गुरू चालीसा

🌷🌷अथ श्री गुरू चालीसा🌷🌷
🌷श्रीगणेशाय नमः श्री सतगुरुवे नमः🌷                            
दोहा:-श्री गुरु सतगुरु सामरथ,विनय करौं कर जोरि।
ऐगुन अघकर्म मेटि प्रभु,बुद्धि प्रगासहु मोरि ।
सात द्वीप नौ खंड में ,गुरु से बड़ा न कोय।
बड़े भाग्य सतगुरु कृपा,जाके ऊपर होय।।
🌷चौपाई🌷
बंदउँ गुरुपद पंकज पावन।
भ्रम संशय त्रय ताप नसावन।।-1
बंदउँ गुरुपद पंकज धूरी।
जो सब भाँति सजीवन मूरी ।।-2
बंदउँ सतगुरु केर खड़ाऊँ।                    
निश दिन रटौं  राम का नाउँ ।।-3
जय जय सतगुरु दीनदयाला।
सदा करत भक्तन प्रतिपाला।।-4
सतगुरु  सम दयालु कोउ नाही।
अस भरोस मोरे मन माही।।-5
राम कृष्ण दुइ ईश सुजाना ।
सतगुरु चरण लगावहिं ध्याना।।-6
जापर कृपा गुरु की होई।
तापर कृपा करै सब कोई ।।-7
सात द्वीप नव खण्ड मंझावै ।
बिन गुरु कृपा ग्यान नहिआवै।।-8
बिन गुरु भक्ति मुक्ति नहि होई ।
कोटि उपाय करै भल कोई।।-9
मूल मंत्र सतगुरु की बानी।
सुमिरत होय सकल अघ हानी।।-10
सतगुरु सकल जगत आधारा ।
सत्य शब्द कहि बेद पुकारा ।।-11
आदि अंत सब सतगुरु साईं।
कहँ लगि बरनौं मैं प्रभुताई ।।-12
गुरु राम गुरु माता सीता।
बन्दत हौं पद कमल पुनीता।।-13
देव दनुज नर किन्नर माहीं।
सतगुरु सरिस पूज्य कोउ नाहीं।।-14
जिनके भे सतगुरु  रखवारे।
ते नहि मरैं  काल के मारे।।-15
तीरथ व्रत जगत महँ जेते।
सतगुरु चरण कमल सब तेते।।-16
अगुन सगुन दुइ ब्रम्ह बखाने।
बिन गुरु कृपा न परहिं पहिचाने।।-17
कल्प बृच्छ सतगुरु सम नाहीं।
करि विचार देखहु मन माहीं।।-18
कल्प बृच्छ इच्छा फल देई।
सतगुरु निज सरूप करि लेहीं।।19
पारस नहिं गुरुदेव समाना।
विरलेन के मन उपजै ज्ञाना।।-20
पारस मणि गुण एक धरावै।
लोहा छुवे सोन ह्वै जावै।।-21
सतगुरु के अनन्त गुण अहहीं।
वेद पुराण संत सब कहहीं।।-22
सहस सारदा शेष मनावै।
गौरि गणेश कोटि कोउ ध्यावै।।-23
सकल धरा कै कागज करई।
सब बनराय कलम पुनि करई।।24
सत सागर की करै सियाही।
गुरु गुन तबहुँ लिखा नहिं जाई।।-25
गुरु अपमान न शिव सहि पावा।
जदपि भुसुंडि शंकरहिं ध्यावा।।-26
जब शिव श्राप भुसुण्डिहिं दीन्हा।
गुरु दयाल तेहिं पावन कीन्हा।।-27
जे गुरु कै नित दरसन करई।
ताकर कोटि जन्म अघ जरई।।-28
जेहि मन सतगुरु चरण अधारा।
तेहि के राम रहत रखवारा।।-29
जे नित गुरु चरणामृत चाखै।
सूरति सत्यनाम महँ राखै।।-30
जे गुरु पद रज माथे लावइ।
कोटि तिरथ कै फल सो पावइ।।-31
जेहिका मिलै गुरु की जूंठन ।
मानहु मिली अमी रस घूंटनि।।-32
जे निज गुरुहिं राम सम जानै।
तेहि कर भक्ति राम जिउ मानैं।।-33
जे गुरू चरनन सुरति लगावै।
सहजै राम भक्ति सो पावै।।-34
करि पुनि विनय चरण धरि माथा।
बंदउँ श्री सतगुरु रघुनाथा।।-35
सतगुरु संत संत सिरताजा।
शरण गहे कर राखहु लाजा।।-36
सतगुरु संत भक्त हितकारी।
सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।-37
निज जन जानि मोहिं अपनाओ।
भ्रम संसय सब दूरि भगाओ।।-38
प्रभु शिव शरण संत भगवाना।
मों कहँ देहु भक्ति वरदाना।।-39
"अधम"जयबख्श की विनय सुनीजै। 
सतगुरु भक्ति दान मोहिं दीजै।।-40
🌷दोहा🌷
गुरु राम गुरु कृष्ण हैं ,
गुरु हैं शिव का रूप ।
तीनिउ कै प्रतिरूप हैं,
सतगुरु सत्य सरूप।।🌷🌷

सो०-🌷माँगत हौं करि नेह ,
चरण कमल तर माथ धरि ।
राखि शरण महँ लेहु ,
मोहि नाथ प्रभु शिव शरण ।।

🚩🌷   आरती  🌷🚩
ॐ जै सतगुरु साईं,स्वामी जय सतगुरु साईं।
अपनी शरण लगा लो ,अपने हृदय लगा लो,निज सुत की नाईं।. .....ॐ जय ...
तुम पूरण परमात्मा ,तुम अंतरयामी।
सत्य पंथ संचालक सत व्रत अनुगामी।..ॐ जय ..
तुम हो एक अगोचर,जग मंगलकारी।
दीन बंधु करुणाकर, भक्तन हितकारी। ॐ जय...
देव, दनुज, नर, किन्नर, सब तेरे चेरे।
ऋषिवर, मुनिवर, कविवर,चरनन चित्त धरे।ऊँ जय .......
ब्रह्मा ,विष्णु, सदाशिव , तुमको नित ध्यावैं,वेद पुराण शास्त्र सब तुम्हरो यश गावैं..।ॐ जय..
मात पिता तुम मेरे, तुम पालन कर्ता।
पार ब्रम्ह परमेश्वर,कृपा करो भर्ता..।ॐ जय..
गणिका गीध अजामिल,गजराजहिं तारेव।
भक्त जनन के हित प्रभु,तुम नर तन धारेव ..।ॐ जय...
सतगुर जी की आरति,जो कोई जन गावे अष्टसिद्धि नव निधि फल,निश्चय ही पावे..।ॐ जय सतगुरु साईं,स्वामी जय सतगुरु साईं।।🚩🚩🌷🌷🚩🚩

Monday, March 25, 2019

समर्थ साईं जगजीवनदास बंदना

अथ श्री जगजीवन वंदना🌷
जगजीवन शरणम् ममः,जगजीवन शरणम् ममः,जगजीवन शरणम् ममः,श्री जगजीवन शरणम् ममः(1)
अभरन जी की सीढ़ी बोले जगजीवन शरणम् ममः,
घाघरा जी की लहरें बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
श्री दलखम्भन कूप बोले जगजीवन शरणम् ममः,
श्री कोटवाधाम की गलियां बोलें जगजीवन शरणम् ममः।जगजीवन शरणम् ममः---------(4)
मन्दिर मन्दिर घन्टा बोले जगजीवन शरणम् ममः,
घण्ट शंख सहनाई बोले जगजीवन शरणम् ममः,
चारि पावा चौदह गद्दी  बोले जगजीवन शरणम् ममः,
भक्त मण्डली मिलकर बोले जगजीवन शरणम् ममः,-जगजीवन शरणम् ममः--–---(4)
बाग बाग वन उपवन बोले जगजीवन शरणम् ममः,
खजुरी वन के वृक्षो बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
फूल फूल पर मधुकर बोले जगजीवन शरणम् ममः,
डाल डाल पर पक्षी बोले जगजीवन शरणम् ममः,-जगजीवन शरणम् ममः-----(4)
कोयल काग पपीहा बोले जगजीवन शरणम् ममः,
दूध पिलाती गैय्या बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
आंगन बीच चिरैया बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
सरिता ताल तलैया बोलें जगजीवन शरणम् ममः,-जगजीवन शरणम् ममः-----(4)
बालक युवा वृद्ध सब बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
कोटवा के नर नारी बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
कोटवा पशु पक्षी बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
जीव जंतु कोटवा के बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
कोटवधाम का राज कण बोले जगजीवन शरणम् ममः,जगजीवन शरणम् ममः----(4)
वृंदावन व्रज गोकुल बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
पुरी द्वारिका काशी बोले जगजीवन शरणम् ममः,
अवधपुरी प्रयाग जी बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
चारों धाम अहर्निश बोलें जगजीवन शरणम् ममः,जगजीवन शरणम् ममः---(4)
क्षीर सिंधु कैलाश बोले जगजीवन शरणम् ममः,
गंगा यमुना सरयू बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
सरस्वती तिरवेणी बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
झरना झील सरोवर बोले जगजीवन शरणम् ममः,-जगजीवन शरणम् ममः-----(4)
सूर्य चँद तारागण बोले जगजीवन शरणम् ममः,
पानी पवन औ अग्नी बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
भूत प्रेत बैताल बोले जगजीवन शरणम् ममःगगन धरा पाताल बोले जगजीवन शरणम् ममः,-जगजीवन सरम्म ममः------–(4)
वेद पुराण उपनिषद बोले जगजीवन शरणम् ममः,
निर्गुण सगुण ब्रह्म पुनि बोलें जगजीवन सरम्म ममः,
ब्रम्हा विष्नु महेश बोलें जगजीवन शरणम् ममः,शारद शेष गणेश बोलें जगजीवन शरणम् ममः,-जगजीवन सरम्म ममः-------(4)
तैंतीस कोटि देवता बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
नारद जी की वीणा बोले जगजीवन शरणम् ममः,
मुरलीधर की मुरली बोले जगजीवन शरणम् ममः,
शिव शंकर का डमरू बोले जगजीवन शरणम् ममः,
हनूमान की करताल बोले जगजीवन शरणम् ममः,--जगजीवन शरणम् ममः-----(4)
देव दनुज  नर किन्ननर बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
जलचर थलचर नभचर बोले जगजीवन सरन ममः,
सात द्वीप नव खण्ड बोलें जगजीवन शरणम् ममः
कोटि कोटि ब्रम्हांड बोलें जगजीवन शरणम् ममः,-जगजीवन शरणम् ममः-----(4)
ऋषी मुनी सन्यासी बोलें जगजीवन शरणम् ममः,
योनि लक्ष चौरासी बोले जगजीवन सरन। ममः,
सकल जगत सचराचर बोलें जगजीवन शरणम् ममः-,।।जगजीवन शरणम् ममः,जगजीवन शरणम् ममः,जगजीवन शरणम् ममः,श्री जगजीवन शरणम् ममः। 
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🚩🚩🚩

सत्यनाम अष्टक

🌷अथ श्री सत्यनाम अष्टक🌷
🌷सत्यनाम प्रभुख्याय प्रभुर्वे सर्वे साक्षिणे।
समाधिस्थाय देवाय दिव्यरूपायवैनमः।।
सत्यनाम ते आधिकी, होत जौ कौनिउ बात।
तौ गुरूदत्त विशेषि कै, सिखन ताहि ढिग जात।।
सत्यनाम सम और न दूजा।
जेहि कै सन्त करैं नित पूजा।।
सत्यनाम मा तीनि गुन, हैं कृसानु रवि चँद।
जारे कर्म प्रकाश करि ,शीतलता सुखकन्द।।
सत्यनाम जे सुमिरै मन मा।
तिनके दुःख न व्यापै तन मा।।
सुना सत्य सतिनाम का,बड़ा अहै अकबाल,
जेहि के सुमिरन के किहे, निकट न आवत काल।।
सत्यनाम ते सबकुछ होई।
प्रीति लगाय भजै जो कोई।।
सर्व मन्त्र ते अधिक है, सत्य सत्य सतिनाम।
सुमिरहु सुरति सुधारिकै,पावहु सुख विश्राम।।
सत्यनाम की बलि बलि जाई।
गुरु की कृपा  नाम रटि लाई।।
तप तीरथ मख दान ते ,जीव जाय सुरलोक।
गुरूदत्त दास सतनाम भजु, जौ मन चहत विशोक।।
निरगुन सरगुन सम करि जानहु।
सत्यनाम सुमिरन प्रण ठानहु।।
सत्यनाम की समिता, दूसर कतहुँ न और।
देखा ज्ञान विचारि कै, जहँ लगि मन की दौर।।
जे सतनाम निरन्तर रटते।
ते भवजाल कबहुँ नहि परते।।
जे सुमिरै सतनाम का,गुरु चरनन धरि माथ।
जन गुरूदत्त विशेषि कै, रहैं राम तेहिं साथ।।
सत्यनाम निश्चय मन जिनके।जन गुरूदत्त चरण परूँ तिनके।।
सत्यनाम एक मंत्र है,सब मन्त्रन सिरताज।
हमरे आजा का दिहिनि,जगजीवन महराज।।
सत्यनाम जो चित मा धरहीं।
भवसागर गो पद सम तरहीं।।
सत्यनाम सबते अधिक, समुझै बिरला कोय।
गुरूदत्त दास जिन समझा, तिन मन राखा गोय।।
सत्यनाम अष्टकमिदं प्रात पठेन्नर यस्य।
जगजीवन कृपया सदा, जगजीवन तस्य।।
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अर्ज विनती स्त्रोत

🌹अथ अर्ज विनती स्त्रोत कृत समर्थ साहब देवीदास जू🌷🌷
सतगुरु सरन मैं तोरि,
सुनु अर्ज विनती मोरि।
तुम अहौ सिरजन हार,
मैं सुना यहि संसार।
तुम बड़े दीन दयाल,
कियो सबनि का प्रतिपाल।
मैं आयउँ सरन तकाय,
समरस्त कै सुधि पाय।
अब मोहिं आपन जानु,
मोहिं सरन अपनी आनु।
मोहिऔर नाहीं दाँउ,
दै शीस पकरौं पाँउ।
कुछ किये बनी उपाउ,
समरस्त नो तुम राउ।
तुम आहु बंदी छोर,
केहि करौं जाय निहोर।
जस परै तुम कँह जानि,
मैं आयहुँ यह प्रण ठानि।
अस कहौं तुम्है सुनाय,
कस दिहेव मोहि बिसराय।
मैं कीन कौन गुनाह,
जो मिटै नाहि अथाह।
अस कौन दूसर ठाँउ,
जो तहाँ को मैं जाँउ।
अस देहु मोहिं सिखाय,
रहौं तुम्है ना बिसराय।
परतीत पकरहुँ डोरि,
कोउ सकै नाहीं तोरि।
फिरि काहु नाहिं डेराउँ,
कहौँ तोर तब कब आँउ।
जो लेहु ना सुधि मोरि,
तौ किरति करौं न तोरि।
जब आय दरद समाय,
तब जाब कँह बिसराय।
जब कहौं तुमते भेंटि,
तब देहु सब दुख मेटि।
तब किये बनी उपाउ,
जब कहहुँ की बलि जाँउ।
तब चली ना फरफन्द,
तुम आहु मुरति अनंद।
जब लेहुँ तुम्हरै नाउँ,
तब करिहौ कौन उपाउ।
जब रहौं सूरति घेरि,
कहौँ सकल दरद गरेरि।
जब दरद उपजीआनि,
तब कहौँ किरति बखानि।
जस भयो है युग चारि,
तस दरद सुनौ हमारि।
प्रह्लाद ध्रुव की ओर,
तस बनी चितए कोर।
 जस सघन बोहित पार,
कियो जानि जन निस्तार।
जस राखि द्रुपदी लाज, 
किये बनी सुनत अवाज।
जस पैज गज हित कीन,
अस जानि मैं सुधि कीन।
लियो जरत पांडव राखि,
सोइ कहौं आपन भाखि।
सोइ भयउ अवसर मोंहि,
सुधि कीन तब मैं तोहिं।
अब बिरद सकल संभारि,
तौ लेहुँ मोहिं उबारि।
अब थक्यो गुन बल मोर, 
केहि करौं जाय निहोर।
समरस्त तुम अस पाय,
केहि कहौं मैं गोहराय।
समरस्त दीनदयाल,
जन जानि करहु निहाल।
यह नही अपजस थोर, 
जस लेहु बन्दी छोर।
अपजस करै संसार,
तब करिहौ कौन विचार।
अब किहे बनी सनाथ,
मैं दीन चरनन माथ।
समरस्त दाता मोर,
यह दान तुम कँह थोर।
जगजीवन प्रभु दियो ज्ञान,
कियो देवीदास बखान।
जब भयो मन आधीन,
मन कियो बहुत मलीन।
जब कह्यो सरनहिं  आनु,
मोहिं दास आपन जानु।
तब दया सदगुरु कीन्ह,
दियो नाम आपन चीन्ह।
भयों सुमिरि सुमिरि निहाल,
नित कहौं मैं बुधि बाल।
जगजीवन अस गुरु पाय,
भजु देवीदास दृढ़ाय।
यह अरज विनती ज्ञान,
सुनि समुझि लावहु ध्यान।
फिरिअन्त होहु निहाल,
समरस्त दीनदयाल।
दोहा:चरन कमल छूटै नहीँ, लागि रहै दिन राति।
सुख अनंद तिहिं सदा है, ब्याकुल कहु केहि भांति।।
कर्म भर्म का देश यह,भक्ति देहि बिसराय।
सुमिरि नाम सुख बास करि,सतगुरु सरन तकाय।।
नाम सत्य कर्ता पुरुष,जेहि मन अंतर्ध्यान,
भक्ति दाहिनी गुरु कृपा, सोइअस्थिर स्थान।।
चरन शीस दै मैँ कहहुँ,केवल नाम अधार।देविदास सोइ नाम लै,जन सब उतरैँ पार।।
सोरठा:नहि कछु करहु तेवान,सुमिरि सुमिरि वहि नाम का।
करिहँहिं सब औसान, देविदास भजि भजि कहैँ।।
भवजल उतरै पार, सुमिरि सुमिरि जन नाम का।
देविदास अतिबार,भजिहि सो उतरिहि नहिं बृथा।।
दोहा:सतगुरु देवीदास कृत,बानी परम पुनीत।
प्रेम सहित नित पाठ ते,बसै भक्ति हित चीत।।इति;-🌹🌹

साल्हा ग्रन्थ चतुर्थ चरण

🌷साल्हा चतुर्थ चरण:-कृतश्रीसमर्थ साहब गुरुदत्त दास जू(पुरवाधाम)
सवैया:-जे भे दास पवनसुत के,तिनका कहौ काम कहाँ करसै।
अघ औगुन कोटि किए तन जे,करतै गुन गान सबै झरसै।
सुख संपति नाम दयानिधि को,हनुमान अनुग्रह ते सरसैं।
गुरूदत्त कहैं मन ध्यान धरै,तेहि पर बजरंग हाथ परसैं।।(राम)
मन तौ मारे मरतै नाहीं, मन का मोहड़ा बड़ा करेर।
मन तौ मन का लै भरमावै, मन के अहैं अनेगन फेर।
ग्यान गुरु है पासहिंअपने,तेहिते कस न लियहु सल्लाह।
मन मारै कै जुगुति बतैहैं,होई आदि अन्त निर्वाह।
क्षमा केरि जो ढाल बनावै,औ गुरु ग्यान केरि तलवारि।
अपने मन का मारि लियत हैं, तिन्हका लागै भक्ति पियारि।
"र"कहि रण मा कस नहिं पिलहू, वैसेन "म"कहि मन का मारु।
जन गुरुदत्त सुमिरि दुइ अक्षर, सहजहिं माया कटक बिदारु।
तन बासिन्ह कै कहेन लड़ाई, ग्यानिहु मन मा करहु विचार।
सेवहि सन्त नाम रटि लावै, बिनु श्रम भवनिधि उतरै पार।
रामभक्त है बड़ा सिपाही, तिन कर कृष्ण भक्त है भाय।
सेवहिं संत नाम रटि लावै, वह तौ कालहु ते बतलाय।
प्रभु जगजीवन का जस गावौं, मैं तौऔर न जानौं बात।
सब संतन के चरण मनावौं, मन के मिटै सबै उतपात।
सतगुरु बँश देहिं जेहिं सेल्ही,पकरहिं हनूमान तेहि बाँह।
जन गुरुदत्त नाम रटि लावै, तेहि पर द्रवहिं
जानकी नाँह।
प्रभु जगजीवन की सब मर्जी, साल्हा कहिनि शिरोमणि दास।
गावै सुनै प्रीति करि जे कोउ,तेहिकै बढ़ै नाम विश्वास।
सवैया:-जे सीताराम पुकार करैं, तिन ते नित नेह बढ़ावत हौँ।
जे राधा कृष्ण का नाम लियइ,तिनके पद शीष नवावत हौँ।
प्रति श्वांस सदा सत शब्द रटै, तिनक पद पंकज ध्यावत हौँ।
गुरुदत्त के दूसर बात नहीं, जगजीवन के गुण गावत हौँ।(राम)

साल्हा ग्रन्थ त्रृतीय चरण

🌷साल्हा त्रृतीय चरण कृत श्री समर्थ साहब "गुरुदत्त दास साहब(पुरवाधाम)🌷

🌷सवैया;-वीर प्रधान अहौ हनुमान, सदै जन के तुम काज सँवारे।
ग्यान ध्यान विवेक विमल फल, चारिलहैं जेहि ओर निहारे।
वेद पुराण बखानत हैं यश सन्तन के प्रिय प्राण अधारे।
जन गुरुदत्त के भीर हरो,अब वास हृदयँ करौ रामदुलारे।।।राम
     ।।"साल्हा"त्रृतीय चरण।।
पांच पचीस बडे़ परपंची,जिनसे सदा रहेव
हुँशियार।
नाहीं तौ पकरि नरक लै जइहैं, तौ तुम रोइहौ छाँडि डफार।
काम क्रोध का डंका बाजै,आगे लोभ ध्वजा फहराय।
यहि तीनिउ ते भागि बचै जो,तब वह सुमिरै नाम अघाय।
काम क्रोध मद लोभ कसाई,चारिउ जीव केर बटपार।
जौनेक भैय्या मोह कहतहैँ,वह सब पापिन का सरदार।
विमल विचार क्षमा मन आनै,औ संतोष दीनता जान।
तेहिका नृपति विवेक कहावै, अपने हृदयँ नाम निज आन।
मोह के मन्त्री का कहि गावौं, है दुर्बुद्धि सिंह जेहि नांव।
है गुरु ग्यान विवेक कै मन्त्री, जेहिकी बार बार बलि जांव।
मोह की तिरिया का कहि बरनौं,जेहिका कुमति कुँवरि है नांव।
सुमति कुँवरि विवेक कै तिरिया, वह तौ बसै ग्यान के गाँव।
मोह के पूत बड़े उतपाती,जिनके कर्म कहे न जाहिं।
हैं विवेक के पूत सुकर्मी, वै निज नाम भजैं मन माहिं।
काम सिंह का मोह हँकारै,उदभट सुनौ हमारी बात।
यै काशी मा दुइ राजा भे,जल्दी जाइ करौ उतपात।
विमल विवेक विचारहिं टेरै,सांउत सुनौ हमारी बात।
काम केरि करतूति जनावै,मारहुधरि छाती पर लात।
क्रोध सिंह का मोह हँकारै, उदभट सुनौ हमारी बात।
यै काशी मा दुइ राजा भे,जल्दी जाय करौ उतपात।
विमल विवेक क्षमा का टेरै, बीरों सुनौ हमारी बात।
क्रोध केरि करतूत जनावै, येहिके टूरि लियहु तुम दाँत।
लोभ सिंह का मोह हँकारै, उदभट सुनहु हमारी बात।
यै काशी मा दुइ राजा भे,जल्दी जाय करौ उतपात।
विमल विवेक कहै संतोषहिं,अगहर सुनौ हमारी बात।
लोभ केरि करतूति जनावै, मारहु धरि छाती पर लात।
गरब सिंह का मोह हँकारै, उदभट सुनौ हमारी बात।
यै काशी मा दुइ राजा भे,जल्दी जाय करौ उतपात।
विमल विवेक दीनता टेरै, बीरो सुनौ हमारी बात।
गरब केरि करतूत जनावै, यहिकै टूरि लियहु तुम दाँत।
मोह नृपति उठि आपुहि गर्जा,तब नहिं सूझै आपन परार।
तौ विवेक गुरु शब्द संभारा,होइगा दशौ दिशा उँजियार।।।।(राम)

साल्हा ग्रन्थ द्वितीय चरण

🌷सवैया:-वार न लागि समुद्र के लाँघत, लंकहि जारि सुरन बन्दि छोरी।पैठि पताल मारि महिरावण, राम लखन लायहु बरिजोरी।
जे कोउ मोहिं सतावत है, तेहि अँजनि नन्दन डारु मरोरी।जन गुरुदत पुकारि कहैं, हनुमान अहौँ शरणागत तोरी।।।राम
          "साल्हा "द्वितीय चरण
पापिन के मैं पास न बैठौं,वैसे परत्रिय देखि डेरावँ।
गुरु जगजीवन की कृपा ते,निसदिन रटउँ
राम का नाम।
परत्रिय विषम जहर का प्याला, जेहिके छुये बुद्धि मरि जाय।
तेहि ते सन्त रहत हैं न्यारे, सुमिरैं राम नाम लौ लाय।
धन औ धाम देखि जन भूलेव,यह कछु अन्त न आइहि काम।
दिनाचारि कै है जिन्दगानी, यारौं रटौ राम का नाम।
काहेक गरब गुमान करत हौ,काहेक करौ मोर औ तोर।
सुमिरत रहौ नाम दुइ अक्षर, निसदिन सुनौ गगन घनघोर।
पर उपकार नाम रटि लावौ,ऐसो बहुरि न पइहौ दाँव।
यारो जग महँ जस रहि जाई,कि रहि जाई विष्णु कर नाव।
राम रहीम करीमा केशव, वैसेन अलह अलख सब एक।
गुरुदत्त दास सतनामहिं सुमिरौ,मन ते तजिके तर्क अनेक।
राति रेंगावै औ दिन धावै,मन कतहूँ न करै मुकाम।
सुमिरै नाम बसै कोटवा मा,तेहिकै सुफल होइ सब काम।
जौ रजपूत रकारै पावै,तौ मन और न करै विचार।
गुरु जगजीवन की किरपा ते,यहु तौ भा भवसागर पार।
पानी पियै पियास के लागे,वैसेन भूख हुवै तौ खाय।
रहै भरोसे सत्यनाम के,सो तौ तरि बैकुण्ठ हिं जाय।
पहिल पवांरा भा सतयुग मा,बीरा आदिशक्ति उठि लीन्ह।
शुम्भ निशुम्भ का मारि संहारेउ,लैके राज दधीचहिं दीन्ह।
दूसर पवांरा भा त्रेता मा,बीरा हनूमान उठि लीन्ह।मारि रावना का सर करिकै, लै के राज विभीषण दीन्ह।
तीसर पवांरा भा द्वापर मा,बीरा अर्जुन पाँडव लीन्ह।
मारि कौरवहिं गर्द मिलायहु,लैकरि राज युधिष्ठिर दीन्ह।
चौथ पवांरा भा कलियुग मा,बीरा दूलन देवी लीन्ह।मोहड़ा रोंकेउ काम क्रोध कै,निसदिन राज चँदेलहिं कीन्ह।।।राम🌷🌷

साल्हा ग्रन्थ प्रथम चरण

🌷"समर्थ साहब गुरुदत्त दास जू" तृतीय गद्दीधर महन्त (तृतीय पावा "समर्थ साहब देवीदास"पुरवाधाम) द्वारा रचित साल्हा ग्रन्थ जो कि भक्ति ग्यानसे पूर्ण आध्यात्म क सागर है, जिस  का प्रथम चरण आप सभी भक्तों के लिए प्रस्तुत है, आनंद लीजिए।

🌷सवैया:-ध्यान धरै गुरु मूरति का सतनाम कै जिकर निरंतर लावै।
पाँच पचीस दसौ करि स्थिर, मन चँचल यह बहै न पावै।
बोलै सत्य असत्य कहै नहिं,कुमति दुराय सुमति प्रकटावै।
जन गुरुदत्त हुवैं ई लक्षण तौ सतनामी सन्त कहावै।(राम)।

श्री गणपति शारदहिं मनावौं, वैसेन ब्रम्हा विष्णु महेश।
सबसे अधिक गुरु का जानौं ,जिन मोहिं दीन नाम उपदेश।
सतगुरु जगजीवन जग आये, तबते अधम उठे हरषाय।
सुनि सतनाम रामपुर जइबै,जम की धरि छाती पर पाँय।
सत्यनाम की कीरति सुनि सुनि ,पापी आपस मा बतलाँय।
धागा बाँधि नाम रटि लाउब, नरकै जाईहि मोरि बलाय।
सत्यनाम मन्त्रन का राजा ,जेहिके भजे होइ सिध काज।
प्रभु जगजीवन सतगुरु साहब,हैँ सब सन्तन के सिरताज।
देवन मँह महादेव बडे़ हैं, वैसेन तीरथराज प्रयाग।
संतन मँह जगजीवन साहब,जिनका सत्यनाम हित लाग।
प्रभु देवी, प्रभु दूलन जानहुँ, वैसेन प्रभु गोसाईं सुख धाम।
साहेब ख्याम के चरण मनावौँ,निशदिन रटउँ राम का नाम।
चारि वजीर चौदहउ गद्दी, जानौँ सबै राम का रूप।
प्रभु जगजीवन की कृपा ते, निशदिन सुमिरौं नाम अनूप।
सत्यनाम जो रटै निरन्तर, तेहिके चरण नवावौँ शीश।
कृपा करहु गुरुदत्त दास पर ,जल्दी आय मिलहु जगदीश।
ब्रम्हा विष्णु शिव शारद नारद,देवता सबै तैँतिसहु कोटि।
कृपा करहु गुरुदत्त दास पर,जहँ लगि अहौ बड़े औ छोटि।
नर तन पाय न हरि हर सुमिरै,और न करै सन्त सतकार।
तेहिकै जनम अकारथ जानहु, वहिके जीवै का धिक्कार।
सीताराम भजन करु प्यारे,औ करु नित परार उपकार।
नाहिं तौ काल कलेवा करिहैँ,तब तुम रोइहौ छाँड़ि डफार।
पर उपकार नाम रटि लावै,राखै गुरु चरणन पर ध्यान।
परत्रिय मातु बराबर जानै,जेहिके अनुभव उपजै ग्यान।
कोउ कोउ तीरथ व्रत करत है, कोउ कोउ पूजै कास पषान।
जन गुरुदत्त नाम रटि लावै, सुनि सुनि गैव मुरलिया तान।।।।🌷🌷

Sunday, March 24, 2019

जगजीवन साहब की दिव्य रचना

🌹दोहा:-साहेब समरथ जगजीवन, स्वतः सनातन विष्णु।
सुभग सुलोचन जगजीवन,सुमुख सुकर पद कृष्ण।।
दोहा:-जगजीवन निर्गुन अलख,निराकार निरधार।
निजानंद निर्दुन्द अज,स्वयं ब्रम्ह अवतार।।🌷🌷
बंदउँ जगजीवन जग तारन।
संशय रुज दुःख दोष विदारन ।।
बंदउँ जगजीवन जगदीशा।
तारन तरन सो विस्वावीसा।।
बंदउँ जक्त प्राण जगजीवन।
मंगल करन अमंगल सीवन।।
बंदउँ जगजीवन दुःख भंजन।
सब विधि जनहि मिटावत रंजन।।
बंदउँ जगजीवन अनमोला।
रचत जमीं असमान अंडोला।।
बंदउँ जगजीवन करतारा।
ब्रम्हा विष्णु रुद्र जिन सारा।।
बंदउँ जगजीवन प्रभु स्वामी।
अलख निरंतर अंतरयामी।।
बंदउँ जगजीवन अवगाहा।
चरित अपार न पावत थाहा।।
बंदउँ प्रणतपाल जगदीशा।
चरणकमल पर वारहुँ शीशा।।
बंदउँ जगजीवन की रचना।
मन कर्म वचन भजसि तेहि कस ना।।
रचिनि ब्रम्ह निर्गुण अरु माया।
रचिनि निरंजन अलख औ काया।
रचिनि भूमि आकाश अपारा।
रचिनि चन्द्र सूरज औ तारा।।
रचिनि पवन पानी औ आगी।
रचिनि कोटि तैंतीस विरागी।।
रचिनि शेष कच्छप बाराहा।
रचिनि वेद चारिउ अवगाहा।
रचिनि भूत औ प्रेत पिसाचा।
रचिनि देवि देवन मत काँचा।।
रचिनि पुराण अष्ट दस शोभा।
रचिनि शाश्त्र षट लखि मन लोभा।।
रचिनि दुःख अरु सुख पुन्नि पापा ।
रचिनि करत सब भाषत आपा।।
रचिनि क्रोध अरु मोह सो कामा।
रचिनि शोक संशय कर यामा।।
रचिनि तपी सन्यासी योगी।
रचिनि विविध षट रस को भोगी।।
रचिनि मूर्खता औ अभिमाना।
रचिनि शारदा वचन प्रधाना।।
रचिनि कपट पाखण्ड अनेका।
रचिनि धर्म अधर्म विवेका।।
रचिनि लक्ष चौरासी योनी।
रचिनि होत अनहोनी होनी।।
रचिनि जाति औ पाँति विचारा।
रचिनि साँझ दिन रात सकारा।
रचिनि छाँह अरु घाम अरामा।
रचिनि शीत गरमी धन धामा।।
रचिनि रत्न भूषण रज सोना।
रचिनि कवीश्वर पँडित होना।।
रचिनि वैद्य ओषधि गुनवाना।
रचिनि रोग धीरज बलवाना।।
रचिनि आदि औ अंत तमाशा।
रचिनि सुगंध विगंध विलासा।।
रचिनि नीक औ जानि बेकारा।
रचिनि वस्तु जग विविध प्रकारा।।
चौदह भुवन लोक त्रै जाना।
रचिनि कृपाल पलक महँ माना।
रचिनि कृपाल पलक महँ माना।।🌹
दोहा;-दीनानाथ दयाल जू,दीनबन्धु जगदीश।
दुखिया दीन नेवाजिये,दीनार्त कोटवाधीश।।🌷🌷

श्री सतनाम पचीसी

🌷ॐ 🌷
श्री सद्गुरुवे नमः श्री सत्यनामाय नमः
                 🌹🌹🌹
🌷अथ श्री सतनाम पचीसी लिख्यते🌷
"वाणी समर्थ साहब गुरूदत्त दास जू"
                   🌷पुरवाधाम🌷
वाल्मीकि की गति विदित, ठग ते भे मुनिराय।
अस प्रताप सतनाम का,कस न भजो चितलाय।।
जल बूड़त गजराज का,लीन गोद बैठाय।
अस प्रताप सतनाम का ,कस न भजो चितलाय।।
कीन विभीषण लंकपति, रावन बंश मिटाय।।अस प्रताप सतनाम का------
मृगी बची वन बीच में, कहिसि शरण गोहराय।।अस प्रताप सतनाम का--------
टेर टिटिहरी की सुनत,अंडा दीन मंगाय।
अस प्रताप सतनाम का--------------
जरत बचे सुत पांडु के,अर्जुन पांचो भाय।
अस प्रताप सतनाम का-------------–
कुब्जा दिव्य स्वरूप भई, कंचन देखि लजाय।।अस प्रताप सतनाम का--------
सबरी के जूठे बेर, सरहि सरहि प्रभु खाँय।।अस प्रताप सतनाम का---------
गनिका के अघ मेटिकै,लीन विमान चढाय।।अस प्रताप सतनाम का---------
राजा रोग मिटाइकै, हंसन दीन छोड़ाय।।
अस प्रताप सतनाम का-------------
साग अलोना विदुर घर, भोजन कीन अघाय।।अस प्रताप सतनाम का--------
धर्म पुत्र की यज्ञ मा, सुपच विराज्यो आय।।अस प्रताप सतनाम का----------
द्रुपदी लज्जा के समय,चीर बढ़ायो आय।।अस प्रताप सतनाम का----------
माधवदास जड़ान जब, निज सकलात ओढ़ाय।।अस प्रताप सतनाम का-------
चढ़ुआ बंधा मलूक पर, लायो माफ कराय।।अस प्रताप सतनाम का---------
भक्त त्रिलोचन के भवन, टहलू भे हरि आय।।अस प्रताप सतनाम का---------
मीरा विष अमृत भयो,नृपति रह्यो खिसियाय।।अस प्रताप सतनाम का-----
भक्त तिलोक सोनार हित, जेवर दीन मंगाय।।अस प्रताप सतनाम का---------
तूरि जंजीर कबीर का,दीन्हेव तीर लगाय।।अस प्रताप सतनाम का---------
ठगहिं मारि जयदेव का,सतगुरु लीन बचाय।।अस प्रताप सतनाम का----------
हिरणाकुश का मारि कै, जन प्रह्लाद बचाय।।अस प्रताप सतनाम का---------
नामदेव हित कारन, मुर्दा गाय जियाय।।
अस प्रताप सतनाम का--------------
श्री नानक के हेत का,चक्की दीन चलाय।।अस प्रताप सतनाम का--------
मंजारी के सुतन का,अगिन से लीन बचाय।।अस प्रताप सतनाम का----------
कुंवा मा कूवा तोपिगे, निकरे मास बिताय।।अस प्रताप सतनाम का---------
जगजीवन महराज की, कीरति जग में छाय।।अस प्रताप सतनाम का----------
जन गुरूदत्त गरीब का,राम लिहिन अपनाय।।अस प्रताप सतनाम का-------
यह सतनाम पचीसी, पढ़ै सुनै जो कोय।
गुरु जगजीवन की कृपा,आवागमन न होय।।
आवागमन न होय।।।
सतनाम सरकार की जय🌹🌹🌹🌹

Wednesday, March 20, 2019

कीर्ति गाथाएं 29

समर्थ साहिब गुरु दत्त दास जी  अलौकिक प्रतिभा के धनी थे आप सदैव ही  पद्यमई वाणी  में वार्ता किया करते थे आपके श्री मुख से निकली वाणी को श्री लक्ष्मी नारायण जी( एक सहयोगी परम  भक्त )  ही लिखा करते थे आप  सदैव ही नाम जप वा  ध्यान सुमिरन में इतने तल्लीन रहते थे कि स्वयं की अवस्था का ध्यान नहीं रहता था अतः संतो भक्तों में आप सतनामी अवधूत कहे जाने लगे आप की अनेकों कीर्ति गाथाएं आज भी भक्तों के बीच चर्चा का विषय हैं बनारस के एक पंडित जी थे नाम था महावीर प्रसाद  , महावीर प्रसाद जी ज्योतिष होरा शास्त्र मंत्र तंत्र आदि में परम प्रवीण और बहुत ही कुलीन उच्च परिवार के थे प्रौढ़ावस्था प्राप्त होने पर पंडित जी ने सोचा मोक्ष की प्राप्ति के लिए गुरु आवश्यक है किंतु गुरु बनाएं किसे या तो वह मुझसे अधिक ज्ञानी हो या जिसे देख कर ही ईश्वर में आस्था उत्पन्न हो जाए श्रद्धा से सिर  स्वयं ही नतमस्तक हो जाए पंडित जी ने प्रण कर लिया जिसे देख कर श्रद्धा से सिर  स्वयं ही नतमस्तक होगा वही मेरा गुरु होगा अत: योग्य गुरु की तलाश में पंडित जी  भारत के सभी तीर्थों के भ्रमण पर निकल गए पर कहीं योग्य  गुरु ना मिला मन में विचार उठा क्यों ना पास के तीर्थों का भ्रमण किया जाए और घूमते घूमते एक बार आप कोटवा धाम पधारे संयोगवश उस दिन जन्म सप्तमी थी और गुरु पर्व महोत्सव मनाया जा रहा था समर्थ साहिब गुरु दत्त दास जी पुरवा धाम से पधारे थे यहीं पर पंडित महावीर प्रसाद जी को समर्थ साहिब गुरु दत्त दास जी के प्रथम दर्शन हुए
 बस समर्थ साहिब गुरु दत्त दास को देखते ही आप नतमस्तक होकर लेट गए आपको स्वयं का भी बोध ना रहा प्रतिज्ञा याद आई और आपको गुरु मिल गया महावीर प्रसाद जी बहुत समय तक समर्थ साहिब गुरु दत्त दास जी के साथ ही रहे और नाम सुमिरन कर ख्याति प्राप्त हुए  आज हम जो महावीर प्रसाद का पंचांग देखते हैं यह महावीर प्रसाद जी ही समर्थ साहिब गुरु दत्त दासजी  के  शिष्य थे।
                    शुभ सतनाम बंदगी

Saturday, March 16, 2019

कीर्ति गाथा 28

                 एक बार बॉसूपुर गॉव में समर्थ स्वा मी जगजीवन साहब द्वारा सूचित श्री अधविनास महापुराण ग्रन्थब की कथा का साप्ता्हिक पाठ हो रहा था। इस पावन सत्य नामी ब्रम्ह  यज्ञ में भाग लेने के लिए समर्थ सद्गुरू श्री शिवशरण दास जी बॉसुपुर पधारेा भक्तों की इच्छा  थी कि साहब सपरिवार एक दो दिन तक वहॉ पर उपस्थित रहें। उस समय समर्थ साहब का स्वा स्थ य ठीक न होने की वजह से साहब ज्यािदा समय पहले न आ सके, किन्तुक भक्तोंय की इच्छा  पूर्ति हेतु परिवार के अन्य  सदस्यों  के साथ गुरूमाता बॉसुपुर पधारी। भक्त् लोग गुरू परिवार का दर्शन पाकर आनन्दर विभोर हो गये। बस एक अभिलाषा और बाकी थी कि अगर ऐसे पावन अवसर पर सदगुरू के भी दर्शन हो जाते तो यज्ञ सफल होने के साथ सबकी मनोकामना भी पूर्ण हो जाती। और जितना भक्त  लोग अपने सदगुरू के दर्शन के लिए व्याणकुल थे, उतना ही वहॉ साहब भी। आखिरकार साहब ने पुरवाधाम से बॉसुपुर के लिए प्रस्थाजन किया और जब साहेब बॉसुपुर पहॅुचे तो भक्तों  के आनन्द  की कोई सीमा न रही। पूरे गॉव के भक्तह साहब के दर्शन के लिए दौड पडे। आस पास के गॉव के लोंगों को पता चला तो वे भी साहब के दर्शन को आने लगे। रात के करीब नौ साढे नौ बज चुके थे। ठंडी अधिक होने की वजह से साहब अलाव के पास ही बैठे थे वही अलाव के पास ही साहब ने दवा खाकर आराम करने के लिए जाने ही वाले थे कि तभी बॉसुपुर के ही एक भक्ते बासुदेव सिंह जो शायद किसी काम से बाहर गये थे वापस आने पर घर वालों ने बताया कि पुरवाधाम से सहब आये हुऐ हैा तो वह भी साहब के दर्शन के लिए गये। साहब को बन्द गी बजाई और साहब का आर्शिवाद लेकर बैठ गये।साहब ने हाल चाल पूछा और कहा कि अच्छा  मास्टदर साहब अब आराम करने की इच्छा। है आप बैठो मेरी तबियत थोडा कम ठीक हैा ऐसा कहकर साहब लेटने चले गये और इधर मास्टबर वासुदेव सिंह बैठे बैठे सोच रहे थे कि मैं तो अपने मन में एैसा सोचकर आया था कि मै तो जल्दीट से पुरवा दरबार जा नही पाता हॅू। आज साहब आये है तो चलकर साहब के दर्शन भी करूंगा और साहब के श्रीमूख से कुछ ज्ञान कि बातें भी सूनुगां परन्तुद जैसे ही मै आया साहब सोने के लिए चले गये बसुदेव सिंह यही सब सोचते रहें और फिर सोचा कि अब जब साहब चले ही गये तो मैं ही यहॉ अकेला बैठकर क्याे करूंगा चलो मै भी चला जाता हॅू सुबह पुन: वापस आ जाऊंगा वसुदेव सिंह ऐसा सोच ही रहे थे कि तभी साहब कम्बाल ओढकर वापस आये और अलाव के पास बैठ गये। और बोले कि मुझे लगा चलों थोडी देर मास्टरर जी के साथ बैठकर बात चीत करें नही तो मास्टमर वासुदेव यही सोचेगें मै तो साहब के लिए यहॉ आया था। और मेरे आते ही साहब विश्राम करने चले गये। वासुदेव सिंह अपने मन कि बात साहब के मुख से सुन कर आश्चरर्य चकित हो गये। और इतना ही कह पायें कि साहब आप तो अर्न्तआयामी है। और करीब एक घण्टेत तक बैठकर बात चीत करते रहें। अन्तस मे वासुदेव सिंह ने खुद कहा कि साहब अब आप आराम कीजीये और हमे भी आर्शिवाद एंव इजाजत दीजीये।

कीर्ति गाथा 27

         समर्थ सदगुरू साहेब श्री शिवशरण दास जी (पष्टेम गद्दीधर महन्थव पुरवाधाम) समर्थ साहब का संक्षिप्त  परिचय-:
समर्थ सदगुरू श्री शिवशरण दास जी समर्थ साहब देवीदास साहब (पुरवाधाम) के पंचम गद्दीधर महन्थश समर्थ साहब सहॉय दास जी के ज्ये(ष्ठम पुत्र थे आप प्राथमिक पाठशाला में अध्याहपक थे आपका जीवन अत्यदन्तज सादगी पूर्ण था आपने सत्य नाम सुमिरन को ही अपने जीवन का उद्देश्यक माना और आठो पहर आप अजपा जाप करते हुए गांव समाज के हर वर्ग धर्म के लोगों को सतपथ पर चलने की प्रेरणा देते रहे उनको छोटे छोटे बच्चोंर से अधिक ही लगाव था आपने हमेशा गरीब और असहाय लोगों की हर संभव मदद की आप गुप्तर सिद्ध संत थे अपने आप को हमेशा बाहरी आडम्बसर से दूर रखा आपके अनगिनत शिष्य‍ हुए तथा आपसे दीक्षा लेकर अपने जीवन को सवारा एवं आपके बताए सत्यिपथं को अनुसरण किया और आज भी कर रहें है। आपको गुरू परिवार (कोटवाधाम) से अगाध प्रेम था इतना प्रेम गुरू दरबार के प्रति था कि अगर कोई भक्तप कोटवाधाम का दर्शन करके आता और साहब को बताता कि सरकार हम कोटवा दर्शन करके आ रहे हैा तो साहब श्री शिवशरण दास जी इतना आनन्दित और भाव विभोर हो जाते कि उसको बार बार प्रणाम करते, और कहते आप हमारी गुरूद्वारे से आ रहे है आप तो हमारे लिए बन्द नीय है। घर में जाकर कहते कि देखो यह भैया कोटवा धाम दर्शन करके आए हैं। हमारे गुरूद्वारे से आए हैं इनको खूब अच्छाय-अच्छाआ खिलाओ पिलाओ इनकी सेवा करो कई बार तो खुद जाकर प्रसाद और पानी ले आते तो कुछ लोग कहते अरे साहब आप बैठिए हम लोग इनकी सेवा करेंगें तो साहब कहते चलो तुम लोग बैठो अपना अपना काम करो, तुम क्याा जानो, ये हमारे गुरूद्वारे से आए हैं हम खुद इनकी सेवा करेंगेा धन्यम हैं आप समर्थ सद्गुरू साहब और धन्यद है आपकी गुरू भक्ति और गुरू परिवार और गुरू दरबार के प्रति आपका अथाह प्रेम आपके श्री चरणों में बारम्बाऔर बन्दऔगी है।

कीर्ति गाथा 26

          साहब सहॉय दास की कृपा से एक भक्तन को रास्तेत में सत्यउनामी धागा एवं प्रसाद मिलना- सत्यकनाम सम्प्रयदाय मे नाम स्मतरण एंव गुरूपद पंकज सेवा ही भक्ति एवं भगवत प्राप्ति का मूल आधार माना गया है सम्प्र दाय के समस्तत समर्थ साहबानो ने हमेशा अपने भक्तो  और शिष्यों  एवं समाज के समग्र जन मानस के कल्यानणार्थ ही किसी भी परंम्पतरा रीति रिवाज का प्रचलन किया उन्हीज प्रेम एवं भावपूर्ण प्रथा में एक प्रथा यह भी है कि कोई भी सत्यरनामी संत महन्थन जब किसी यात्रा अथवा प्रवास के लिए निकलते है तो यथा संभव उस र्माग में जितने भी प्रेमी भक्त  एवं शिष्यव रहते हैं समर्थ साहेब वहॉ पहॅुच कर दर्शनदेते है तथा भक्तोंे के कष्टों एवं परेशानियों का निवारण करते आए हैं इसी क्रममें तृतीय पावा के पंचम गद्दीधर महन्थक समर्थ साहब श्री साहब सहॉय दासजी कोटवा दरबार से दर्शन करके वापस आते समय चौदह गद्दी मे प्रसिद्ध संत समर्थ कायम दास साहब (रसूलपुर) के निकट स्थित असरफपुर में रात्रि विश्राम के लिए रूके आस पास के गांव के लोंगो को जब समर्थ साहब सहॉय दास जी के आगमन की सूचना मिली तो तमाम भक्त  साहब के दर्शनार्थ इकठ्ठा हुए रात्रि में भजन कीर्तन के बाद प्रसाद गृहण कर अपने अपने घर गये प्रात: होते ही पुन: दर्शनार्थियों की भीड लग गयी क्यो कि साहब आज पुरवाधाम के लिए जल्दी् ही प्रस्था न करना चाहते थे चलने के समय एक भक्तअ ने साहब के साथ पुरवाधाम जाने की प्रार्थना की साहब ने कहा  हॉ हॉ चलो तभी मामा साहेब (समर्थ साहब सहाय दास साहब के साले साहब) ने न जाने क्यों  उस भक्तस को साथ चलने से मना कर दिया, जबकि उस भक्त  ने बार बार प्रार्थना किया कि मुझे भी अपने साथ चलने दीजिए दरबार जाकर साहब की समाधि एवं गुरू माता का दर्शन कर लॅूगा और थोडा दरबार की सेवा भी कर लूगा लेकिन साहब के बार बार कहने पर भी मामा साहब उस भक्तर को साथ ले जाने के लिए तैयार नही हुए अंत में साहब ने कहा कि अच्छास रहने दो, सुखदेव भैयया की बात मान लो, उस भक्तह ने साहब का सामान उठा लिया और बोला ठीक है साहब थोडी दूर तक आपके साथ ले चलिए फिर आपको विदा करके वापस आ जाऊॅगा मामा साहब भी इस बात से सहमत हो गये। वह भक्त  अपने गॉव से दुसरे गॉव तक साहब के साथ गया तो साहब ने कहा अच्छाफ अब तुम यहॉ से अपने घर लौट जाओ, तब उस भक्तब ने रोते हुए साहब का सामान बैलगाडी में रख‍ दिया और फफक-फफक कर रोने लगा तब समर्थ साहब ने कहा कि तुम रोओ मत घर जाओ साहब तुम्हेंय दर्शन का फल अवश्यर देंगें। भक्तम ने साहब को बन्दमगी बजाई और घर के लिए वापस लौट पडा अभी थोडी दूर चला होगा कि साहब की कृपा से उस भक्त  को रास्तेई में एक पत्त ल के दोनें में भभूति प्रसाद एव सत्यबनामी धागा रखा हुआ मिला भक्त् ने प्रसाद लिया और घर जाकर घर वालों को भी दिया और साहब की महिमा सबको बताई । एवं अगली पूर्णमाशी को जब वह भक्ता पुरवा दरबार दर्शन करने गया तो साहब ने कहा आ गये भक्तण राज हमने तुमसे कहा था न कि साहब भक्तों  की इच्छा  अवश्य  पूरी करते है तुम्हेा उस दिन प्रसाद भी मिल गया और आज दर्शन भी मिल गया।

कीर्ति गाथा 25

          साहब सहॉय जी द्वरा रायबरेली के श्रीवास्त व जी को सई नदी में कूदकर आत्मेहत्यास करने से बचाना और उनकी लडकी की शादी भारतीय रेल सेवा में कार्यरत टी टी ई के लडके से होना :-
रायबरेली जिले के श्रीवास्त व जी की माली हालत बहुत ही खराब थी कभी कभी तो स्थिति ऐसी बन जाती कि घर खाने को भी दिक्क त हो जाती। श्री वास्तसव जी का विश्वा स पुरवाधाम के प्रति अटूट था लेकिन यह भी सत्य  है कि जो ईश्व्र के सच्चे  भक्तव होते हैं ईश्व र उनकी परीक्षा भी उतनी ही कठिन लेते हैं श्रीवास्त व जी अपनी गरीबी के दिनों को कभी भी अपनी ईमानदारी मेहनत और पुरवाधाम की आस्थाे पर कभी भी भारी नही पडने देते थे । उन्हेव जब भी समय मिलता पुरवा दरबार दर्शन करने आते साहब और दरबार की सेवा करते श्रीवास्त‍व जी की चिन्ताप थी उनकी लडकी जो कि शादी के योग्यर हो गयी थी परन्तुर शादी कर पाने की स्थिति में न थे। धीरे धीरे श्रीवास्तेव जी का स्वागस्थु भी लडकी की शादी की चिन्ताे के कारण बिगडने लगी तो उनकी धर्म पत्नीय ने कहा कि आप साहब से क्यूथ नही कहते हो सकता है साहब की नजर में कही कोई लडका हो उनकी बहुत जान पहचान है, तमाम भक्तो है साहब चाहेंगे तो अवश्यक कहीं शादी करा देगें। तब श्री वास्ततव जी ने कहा कि साहब से कह तो दू लेकिन अपने पास कुछ तो व्यदवस्थाप होनी चाहिए। ऐसे ही काफी समय बीत गया श्रीवास्तेव जी की उदासी दिन प्रतिदिन बढती ही गयी कहीं कोई रास्तास नजर नही आ रहा था अत: श्रीवास्तिव जी ने एक दिन अपने मन ही मन में एक बहुत कठोर निर्णय कर बैठे। उन्हो ने अपने मन मे सोचा इस माघ सप्तीमी में समर्थ स्वाममी जगजीवन साहब के जन्मोोत्सअव में जाकर दर्शन कर ऑऊ फिर वापस आकर सई नदी में कूदकर अपनी जान दे दॅूगा। मेरे मरने के बाद मेरे परिवार का जो होना होगा वह कम से कम मैं तो न देखॅूगा। अब मेरे पास इसके आलावा कोई दूसरा रास्ता  भी तो नहीं है। ऐसा सोचकर श्रीवास्ताव जी पुरवाधाम साहब का दर्शन किया प्रसाद ग्रहण किया दूसरे दि‍न समर्थ साहब सहॉय दासजी कोटवाधाम दर्शन के लिए जाने लगे तो श्रीवास्तगव जी से कहा कि चलो तुम भी कोटवाधाम दर्शन कर आओ, श्रीवास्तगव जी ने सोचा चलो अन्तिम बार कोटवाधीश के दर्शन कर ही लू क्यों कि दुबारा तो मैं जा न सकॅूगा। अत: साहब के साथ कोटवाधाम गये दर्शन किया। समर्थ साहब सहॉय दास जी सब लोंगो के साथ कोटवाधाम में ही बनी पुरवाधाम की धर्मशाला में आ गये। सब लोग भजन कीर्तन कर रहे थे किन्तुी श्रीवास्तशव जी के मन में व्यकथा और व्यालकुलता इतनी ज्याकदा थी कि उन्हेे वहॉ रूकना मुश्किल हो रहा था। अत: साहबसे आज्ञा लेकर चल दिये। सई नदी के किनारे पहॅुचे तो साहब का दिया हुआ प्रसाद था उसमें थोडा खाया और माथे लगाकर सई नदी के पुल पर एक तरफ रखकर। इधर उधर देखा दूर तक कोई दिख नही रहा था। बस पुल की रेलिंग पर चढ गये और ऑख बन्दर कर जैसे ही नदी में छलॉंग लगाई तुरंत समर्थ साहब सहॉय दास जी ने पीछे से उनको पकडकर ऊपर खींच लिया । श्रीवास्त्व जी ने जब ऑख खोल के देखा तो सामने साहब खडे थे। श्रीवास्त्व जी साहब के चरणों में गिर गये और फूट फूट कर रोने लगे और कहा कि साहब मुझे मर जाने दीजिए मैं जीना नही चाहता हॅू। समर्थ साहब ने उनको समझा कर बोले तुम सोचते हो कि तुम्हा रे मरने से सब ठीक हो जाएगा। तुम्हाारी लडकी की शादी हो जाएगी, तुम्हानरे परिवार की परेशानी खत्मर हो जाएगी तो ऐसे बिल्कुाल नहीं होगा बल्कि परेशानी और बढ जाएगी। श्रीवास्ततव जी ने कहा कि फिर में क्याि करू साहब मुझे तो कुछ भी दूसरी राह नहीं दिखती साहब ने उन्हेत अपनी जेब से एक रूपया निकालकर दिया और कहा कि तुम रेलवे स्टेहशन पर जाओ और जो भी पहली गाडी मिले  उस पर चढ जाना किन्तु  इस रूपये का टिकट भी मत लेना बिना टिकट ही बैठ जाना बाकी सब बडे बाबा ठीककर देंगें। श्रीवास्त व जी साहब की बन्दकगी की और साहब ने जैसा कहा वैसा ही किया। श्रीवास्त्व जी स्टे शन पॅहुचे तो लखनऊ की तरफ जाने वाली गाडी आयी और वे उसी गाडी पर बिना टिकट लिए चढ गये । जब टी–टी बोला कि टिकट क्योंा नहीं लिए मालूम नही है कि बिना टिकट यात्रा करना गुनाह है तो श्रीवास्त व जी ने कहा कि मेरे गुरूजी ने टिकट लेने से मना किया था टी-टी भडक गया और बोला चलो अभी लखनऊ पहॅुचकर तुम्हा री और तुम्हा रे गुरू की दोनो की खबर लेते है, जो तुम्हे  बिना टिकट गाडी पर बैठा दिया। श्रीवास्ततव जी ने कहा साहब आप हमें कोई भी सजा दे दो पर मेरे गुरूजी को कुछ न कहो गाडी जब लखनऊ पहुची तो टी टी ने कहा तुम यहीं बेंच पर बैठो मैं कागज जमा करके आता हॅु भागना मत नही तो ठीक न होगा। अब श्रीवास्त व जी और घबरा गये सोचा अब तो लगता है जेल में मुझे बन्द। करा देगा। वापस आकर टी टी ने श्रीवास्तयव जी से पूछा भूख लगी है तो उन्हो।ने सजल नेत्रों और भारी मन से हॉ मे सिर हिला दिया और मन में सोंचा कि चलों कम से कम कुछ खिला पिलाकर जेल में डालेगा सो कैन्टिन में जाकर दोनो लोगों ने चाय नास्ताि किया और फिर टी टी श्रीवास्ताव जी को अपने घर ले गये। नहाने के लिए कपडे दिये निवृत होकर नहा धो कर दोनो लोग आए और तैयार हुए तब तक टी टी की धर्म पत्नी  जी ने खाना लगा दिया । टी टी कहा चलो खाना खालो और मुझे अपनी पुरी कहानी बताओ। श्रीवास्ताव जी ने रोते रोते हुए शुरू से अपनी आप बीती टी टी को सुनाई उसी समय टी टी का लडका भी स्कूोल से घर आ गया टी टी महोदय ने कहा यह मेरा लडका है और मैं भी श्रीवास्त्व हॅू। क्यार तुम अपनी लडकी की शादी मेरे लडके से करोगे। श्रीवास्त व जी टी टी साहब की बात सुनकर अबाक रह गये टी टी  साहब ने फिर पूछा कि क्याे मेरा लडका तुम्हाबरी लडकी के योग्यग है क्या  तुम्हेक यह रिस्ताल मंजूर है। श्रीवास्ताव जी ने कहा साहब कहॉ आप और कहॉ मैं आप इतने बडे साहब और मेरे पास टिकट तक के पैसे नही हैं मेरे पास तो आपको देने के लिए भी कुछ नही है। टी टी ने कहा कि हमें तुमसे सिर्फ तुम्हा री हॉ सुननी है श्रीवास्तीव जी ने कहा कि साहब मेरे पास आपको और आपके बरातियों को खिलाने पिलाने के लिए भी कुछ नहीं है। मै इतना बडा इन्तकजाम कैसे कर पॉऊगा तब टी टी साहब ने कहॉ सारा इन्तकजाम मैं कर लॅूगा तुम बस मुझे वह एक रूपया दे दो जो तुम्हें  तुम्हाीरे गुरू जी ने दिया है श्रीवास्तूव जी ने गुरूजी की कृपा समझ कर टी टी साहब की बात मान ली और वह गुरू जी द्वारा दिया गया एक रूपया टी टी साहब को दे दिया टी टी साहब ने लडकी लडका पछ का सारा इन्तेयजाम खुद किये शादी हो गयी कालान्तटर में उनके लडके भी हो गये पूरा परिवार सुखी से रहने लगा टी टी साहब के घर में और भी सम्पेन्नउता की वृद्धि हो गयी श्रीवास्तेव जी ने पुरवाधाम आकर साहब का धन्यंवाद अदा किया धीरे धीरे पुरवाधाम की कृपा से श्रीवास्ताव जी की गरीबी भी दूर हो गयी श्रीवास्त व जी की लडकी तो भक्त् थी ही टी टी साहब का पूरा घर पूरवाधाम के शिष्य  बन गये बाद में श्रीवास्तकव जी की लडकी महन्थिन हो गयी। वे पूर्णमासी और जन्म‍ षप्तामी जैसे पावन पर्व पर पुरवाधाम आती है तथा दरबार में साहब और भक्तों  की सेवा करती है।